क्या मैं भी कभी…..?

–  क्षितिज़ प्रकाश


 

बैठा बैठा मैं रहा,

सहमा सहमा मैं रहा,

न साहस थी, न हिम्मत थी,

किससे कहूं, किसको कहूँ ?

वह बात मेरे मन में कांटो की तरह चुभ रही थी –

“क्या मैं भी कभी …..?”

यह सोंचता-सोंचता मैं  सिसकता,

यह सोंचता-सोंचता मैं दिल दुखाता .

 

वहीं पास, एक पंछी हंस रही थी,

मैंने पूछा – ” क्या मुझको देख, तू हंसी ?”

उसने कहा – ” नहीं, मैं तेरे हालात पे हंसी.”

कल तक था तू अच्छा खासा ,

मन में तेरे थी खुशियों की अभिलाषा .

आज परिस्थितियाँ तेरे नहीं हैं अनुकूल,

तो तू बैठा है जैसे एक मुरझाया फूल.

सुन तू मेरी एक बात ,

न खाने को था एक दाना मेरे पास,

मैं रोज़ भटकती थी दिन-रात ,

कभी डाल-डाल, कभी पात-पात,

बता, क्या परिस्थितियाँ थी मेरे अनुकूल ?

क्षितिज़ को देख कर, मैंने पूछा एक सवाल ,

“क्या मैं भी कभी उन पंछियों की तरह ख़ुश रह सकूँगी ?”

“क्या मैं भी कभी अम्बर पर लहरा सकूँगी ?”

“क्या मैं भी कभी……?”

कुछ दिन बीते , कुछ रातें बीतीं,

फिर, अन्दर से एक आस जगी ,

फिर , सोई साँसों में जान लगीं .

हाँ, तू कर सकती है ,

हाँ, तू लड़ सकती है ,

दिल से ये आवाज़ निकली .

मैं उड़ चली फिर,

कभी डाल-डाल, कभी पात-पात.

अंततः, पहुंची मैं मंजिल की छोर ,

क्यूंकि पकड़ी थी मैंने आस की डोर .

 

न ऐसे बिता अपनी जवानी ,

न बनने दे इसे एक व्यर्थ कहानी ,

जोर लगा, मेहनत कर, मंजिल की ओर तू बढ़ .

मंजिल तू पायेगा ,

एक थोड़ी सी आस तू रख .

 

 

 

 

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