नारी…

-अभिषेक बिशनोई


मुझे अपने स्कूली दिनों में याद कराया गया के
“8th of march is international women day!”

मैं सोचता हुँ , आदमियों का कोई दिन क्यों नहीं होता ? या वो इसके लायक नहीं है? कोई लड़की लड़का देखने क्यों नहीं जाती? कभी किसी महिला ने पुरुष के सौन्दर्य का वर्णन क्यों नहीं किया? किसी महिला को गाली देते क्यों नहीं सुना गया? क्यों केवल शराब पीती लड़कियों को ही बदचलन कहा गया ?
सारी कमान पुरुषजात के हाथों में रही है। सारा साहित्य, कायदे-कानून, परिभाषाएँ, विचारधाराएँ ,तुम्हारा लेखन है, तुमने अपने विचार थोपे , मनचाही सती प्रथा सी कुरीतियाँ बनाई , तुमने चीरहरण किया फिर तुम्हीं ने बाजार खोला, तुमने सील दिये उसके होंठ अपनी शराब वाली बेहुदी ठरकी आवाज़ से, वो नहीं बोल सकती, विवाद नहीं कर सकती क्योंकि कमतर है, सबने मान लिया, इसे फिर संस्कार का दर्जा दे के महिमामंडित किया। महिला की सोच को तवज्जो तो क्या , आवश्यक ही नहीं माना गया। उसे तो महज़ एक भोग का साधन माना गया । पुराकाल में राजाओं द्वारा कई रानियां रखी जाती रही है। मैं सोचता हुँ अगर, समय यंत्र द्वारा भूत में जाकर उन्हें एक उजली कलम देकर पुरूषों के लिये कुछ लिखे जाने को कहा जाये तो क्या होगा? और दे दी जाये उन्हें पूर्ण छूट , ज्वालामुखी फूट पड़ेगी, सत्यरूपी लावा आगामी युगों में क्रान्ति लायेगा और अमिट काला साहित्य अंनत तक पुरूष जात को शर्मिंदा करता रहेगा ।

समय गतिमान है, हमारी सोच अभी तक लंगडा रही है। कराहती भी है, मगर कोड़े बरसाये जा रहे हैं । अभी लंबा सफर तय करना है, गांव के उस खंडहर से हो चुके मंका में जो रूबी और पायल रहती है, मुझे उनकी आँखों में एक बड़े स्वप्न की प्रतिक्षा रहेगी। एक लड़की की चाल देखकर चरित्र निर्धारण करने वाले उस पुरुष समाज से हाथ मिलाकर आत्मविश्वास से बात करती एक नारी के लिये करतल ध्वनि की प्रतीक्षा रहेगी ।

बेहतर अब हम समझदार बनें, एक ऐसा समाज बना सकें जिसमें पुरुष और स्त्री बराबर हो। कानूनी पोथें मदद नहीं कर पायेंगे। हमें बदलना होगा सर्वप्रथम खुद को और फिर देखना कुहासा हटते देर ना रहेगी ।
मैं अपनी माँ को देखता हुँ तो हताश हो जाता हुँ ,जैसे उन्होंने लड़ते हुए अपनी जिंदगी काटी है । मगर फिर मैं एक लड़की की आँखों में देखता हुँ जो वाद-विवाद करती है, जो गलत का विरोध करती है, वो क्रांतिकारी भी है, वो प्यारी भी , वो चिल्ला भी सकती है, वो रोती भी है , तो मैं चाहता हुँ मेरी बहिनें भी ऐसी ही बने ,उसके लिये तलियाँ बजती रहे, उसका आत्मविश्वास और मजबूत हो, मैं निश्चित हो जाता हुँ क्षण भर को पर मैं अनंतकाल से संदेह में रहा हुँ, कि वो जिंदा कब तक रहेगी?

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One Reply to “नारी…”

  1. One can also read auto translate English version by clicking on translated
    message!!
    thanks!

    2018-03-08 19:51 GMT+05:30 Akshar : The Literary Arts Society :

    > divyanshkhare99 posted: “-अभिषेक बिशनोई मुझे अपने स्कूली दिनों में याद
    > कराया गया के “8th of march is international women day!” मैं सोचता हुँ ,
    > आदमियों का कोई दिन क्यों नहीं होता ? या वो इसके लायक नहीं है? कोई लड़की
    > लड़का देखने क्यों नहीं जाती? कभी किसी महिला ने पुरुष के सौन्”
    >

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