बचपन

-राघव तिवारी

बचपन एक ऐसी कहानी है जो कही भी गयी है सुनी भी पर न जाने क्यों ऐसा लगता है जैसे यह कहानी कुछ अधूरी सी रह गयी है या फिर ज़िंदगी की दौड़ और प्रतिस्पर्धा में इसे सुनकर भी अनसुना कर दिया गया है। जब भी माँ के हाथ का निवाला याद आता है सोचता हूँ, कुछ ज़्यादा ही जल्दी उस आँचल को छोड़ दिया को, अभी तो उससे बहुत कुछ सीखना बाकी रह गया था| माँ ने समझाने की कोशिश तो बहुत की थी पर तब शायद बड़े होकर भी नादानी कर गया। और करता भी क्या, जीवन और जीविका के आगे मजबूर था। सच कहूँ तो यह मनमोहक कहानी छोड़कर तो मैं भी नहीं जाने वाला था पर पिताजी के थोड़ी सी हिम्मत देने के बाद ऐसा लगा जैसे दुनिया जीत लूँगा और बस यही सोच कर वह  कहानी बीच में छोड़कर चल दिया| मुझे यह ना मालूम था की बाहरी दुनिया कैसी है पर सबको समझना और रिश्ते निभाना तो मेरा ही काम है। मुझे पता है की मुझे दूर करते समय मेरे पिता का हृदय कितना कचोट रहा था पर वे भी मजबूर थे क्यों कि हर समय तो मेरे साथ नहीं हो सकते थे। तो बस इस ही उम्मीद में की मेरा बेटा मुझसे भी बड़ा बनेगा, मुझे प्रेम, ममत्व और पितृत्व की छांव से अलग कर दिया। मुझे मालूम है की प्रत्येक कहानी एक ना एक दिन तो ख़त्म होती ही है, पर आज जब पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है कि इस कहानी में कुछ और वक़्त गुज़ार सकता था। सब कुछ छोड़कर जाने की इतनी भी क्या जल्दी थी कि परिवार की खुशियाँ ही छोड़कर चला गया। जब मुड़कर देखता हूँ तो पाता हूँ कि वो बचपन के सारे दोस्त वहीं ठहरे हुए मेरा इंतज़ार कर रहे हैं। वो खेल के मैदान, वो आस-पड़ोस की गालियाँ, वैसी ही हैं आज भी। वो गलियां, वो मैदान, वो दोस्त मुझमें गुलज़ार हो जाना चाहते हैं।  कुछ भी तो नहीं बदला हैं इतने सालों में फिर भी क्यों सब बदला-बदला सा लगता है। शायद एक मंज़िल, एक मुकाम हासिल करके मेरी नज़र ही बादल गयी है। मैं उस कहानी को वापस सुनना चाहता हूँ पर यह मुक़ाम, यह पदवी रोक देती है मुझे, और मैं उदास सा वापस वर्तमान में आ जाता हूँ जहाँ कि दुनिया सिर्फ़ मुखौटों से भारी पड़ी है। प्रेम की जगह स्वार्थ ने ले ली है और दुनिया इस ही बहकावे में चली जा रही है। जब भी पीछे मुड़कर देखता हू तो परिवार और त्योहार याद आ जाते हैं, वो होली की रंगत और दिवाली का उजियाला याद आ जाता है। वो भी तो नहीं बदलीं पर उन खुशियों को जीने के लिए वक़्त नहीं निकाल पा रहा हूँ, यह भाग-दौड़ और मुक़ाम हासिल करने का जुनून मुझे रोक देता है और इनके सामने मैं सिहर सा जाता हूँ । दिल में तो बहुत कुछ होता है पर कुछ भी कर नहीं पाता हूँ। कभी-कभी सोचता हूँ की वापस वहीं चला जाऊँ पर अब सब इतना बिखर चुका है कि समेटते-समेटते सदियाँ गुज़र जाएगी। कभी-कभी खुद को देखता हूँ तो पता हूँ कि जिस पिता ने हिम्मत देकर यहाँ तक पहुँचाया उससे ही बात करने के लिए समय नहीं निकाल पता। जिस माँ ने इतने प्यार से पाला, कभी-कभी, उस ही पर झल्ला उठता हूँ। सच में बहुत बादल गया हूँ पर इन सब का कारण यह मुक़ाम, मंज़िल, और उम्मीदें हैं। कभी-कभी पीछे मुड़कर देखता हूँ तो पाता हूँ कि कुछ ज्यादा जल्दी ही छोड़ दिया , अगर चाहता तो कुछ समय और जी सकता था, और सुन सकता था इस कहानी को। इतनी भी क्या जल्दी थी??

अब जब कभी भी बचपन की कहानी के बारे में सोचता हूँ तो बस एक ही बात दिल में आती है कि –

खूबसूरत था इस कदर कि महसूस न हुआ,

कि कैसे, कब और कहाँ मेरा बचपन चला गया|

Advertisements

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s