उस पार से

– द्वारा अभिषेक बिशनोई


प्रेम स्वयं एक धर्म है, सबसे बड़ा, करने की हिम्मत क्यों नहीं करते बजाय उसके जाति धर्म जानने के , तुम कितने डरने लगे हो जवान, तुम इतने प्रतिबंधों से बंधित होकर अपना जीवन कैसे व्यतीत कर लोगे? तुम अंदर से खोखले हो। क्रांति लाओ अपने अंदर वीर!”

इतना कहकर भगतसिंह अंदर आये , सुखदेव से पूछा-“के कर रह्या है वीरे?”

यारे ये मेनु मिल गया, साड्डे  पैरेलल यूनिवर्स विच पृथ्वी नामदा गृह मिल गया ,जित्थे सु 87 साल  आये थे , वहाँ आज सड़कों विच लोग थाडे नाम दा बैनर लेके घुम रह्ये हैं, ये ले तु भी वेख”, कहके सुखदेव ने टेलीपैथी भगतसिंह की ओर सरका दिया।

कुछ देर बाद भगतसिंह ने एक पत्र लिखना शुरू जो आज से अनंत प्रकाश वर्षों बाद यहाँ पहुँचेगा।जिसमें लिखा होगा-

मुझे आज कुछ राष्ट्रवादी स्मरण करेंगे  मगर मैं तो नहीं चाहता ये। मेरी कामना तो ये है कि तुम कूरेदती धूप में निकलो उन वातानुकूलित गद्दों पे उजले कपड़ों वालों को घसीट कर नीचे उतारो, मशालें ले लें तुम्हारे हाथ बजाय लाठी या झंडे के, ज्वाला प्रज्वलित हो, तुममें हो क्रोध अन्याय के प्रति , हर उस जनसंहार के प्रति जिसमें बच्चे अपनी माँओं के खून को भी दुग्ध समझ पी गये, जिसमें प्यार का गाँव की चौपाल पर दम घोट दिया गया ।

मेरा देश के नौजवानों!

वक्त को जाया इस गणना में करो कि कितने भिक्षुक ने आज रोटी माँगी तुमसे, तुमने दी नहीं होगी क्योंकि याचक की संख्या बहु थी या आम हो गया है तुम्हारे लिये या तुम आश्चर्यचकित होते  हो कंकाल को मृत्यु के समय भी रोटी की माँग करने से। तुम शर्मिंदा भी हुए होंगे अगर तुममें बची होगी शरम । और अगर तुम्हें क्रोध आया , तो तुम भी मुझ सरीके हो, ये हालात ऐसे क्यों है ? बदलने चाहिये, मगर इससे आगे तुम नहीं सोच पाते। ये सीमा है अगर तुम्हारी तो मेरे मित्र, तुम डरते हो क्रान्ति की अगुवानी करने से, नेपथ्य की ओर जाने से।

नेपथ्य पे अंधकार तो होगा ही, तो क्या तुम उस पथ  पे जाने से इनकार कर दोगे?

तुम्हारी जगह मैं होता तो मैं तो नहीं डरता। मैं तो नहीं रह सकता चुप, तुम्हारी तरह मूक दर्शक बन कर । मैं नहीं कर पाउँगा सहन चीखें जब मेरी आँखों को सामने चीर रहा हो एक जानवर एक इंसान के; जब मेरे ही घर का कोई ,अपनी बेटी समान उस लड़की का चीर हरण कर आया हो; जब एक  शरीर पर डाला जाये पेट्रोल और आग लगा दी जाये बीच चौराहे पे।

चाँदनी रात में राख के पास बैठे अश्रु बहाने वालों, जंग लगी जबानों वालों, चिल्लाते क्यों नहीं हो? बदला क्यों नहीं लेते हो?

और बदला लेने का एकमात्र सही तरीका है क्रांति! कर पाओगे क्या?

या व्यर्थ गँवा दोगे सारा जीवन ऐसे ही पथरीली आँखों से ढलते सूरज को देखकर, बुझी आत्मा से स्वर को मरते देखकर।
मैं भगतसिंह और मेरे साथी एक आधुनिक क्रांति की आस में!

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