रेवती

-आशुतोष उपाध्याय


कोलकाता के St. Xavier कॉलेज की शुरुआती बैचेस में से एक; 1991 वाली बैच का गेट टूगेदर है आने वाले शनिवार को।

“रेवती मैंने तुमसे कहा ना कि मैं नहीं जा रहा हूं, फिर क्यों तुम ज़िद पर अड़ी हो?” इस बार राकेश की आवाज़ में थोड़ी सख़्ती थी।

“राकेश ऐसा नहीं चलेगा! मैं वहाँअकेली कैसे जा सकती हूँ? हम दोनों एक साथ ग्रैजुएट हुए हैं और अब भी एक साथ हैं। मैं भी नहीं जा रही हूँ!” रेवती की आवाज़ रुआंसी थी।

राकेश और रेवती दोनों साथ में पढ़ते थे और अब साथ में रहते हैं। राकेश और रेवती बिल्कुल ही भिन्न किस्म के दो व्यक्ति थे। राकेश था आगरा से और सब से कटा-कटा रहने वाला: वह ना किसी से अधिक बात करता ना किसी सोशल इवेंट में हिस्सा लेता; जबकि रेवती तो बाप रे बाप! लड़की नहीं, बोलने वाली मशीन थी; कॉलेज में सबकी चहेती! St। Xavier में पार्क के बगल में एक ओपन एयर थिएटर था। खाना खत्म करके सभी बच्चे वहीं जाकर बैठा करते थे।

“अरे रेवती आज तू कुछ बोल क्यों नहीं रही है?” आकाश ने पूछा।

आकाश का बोलना खत्म हुआ भी नहीं और रेवती की आँखों से आँसुओं की दो बूँदें छलक पड़ीं। बूँदें गालों पर लुढ़कती हुई जैसे ही नीचे गिरीं, तो  रेवती उठ खड़ी हुई और वहाँ से चली गई। जाते-जाते वह अपने आँसुओं को पोछती और सिसकियाँ भरती। सारे बच्चे चुप चाप बैठे देख रहे थे सभी उदास हो गए। सारे उठकर अपने अपने हॉस्टल जाने लगे।

रेवती कैंपस में मौजूद झील के किनारे आ कर बैठी। आज रेवती को खबर मिली थी कि उसके पिताजी का देहांत हो चुका है। रेवती के आँसू रोके नहीं रुक रहे थे। हल्की सी ढलान वाले उस पथरीले किनारे पर वह सफेद सूट में अपने घुटनों को हल्का सा मोड़े बैठी थी। वह चांद को एकटक निहारे जा रही थी। चाँद की रौशनी से उसकी आंखों में मौजूद तरल चमक रहा था।

राकेश हर रोज की तरह उस रात भी तालाब के किनारे बैठा था; हाथ में अपने परिवार की एक प्यारी सी फैमिली फोटो लिए वह उसे निहारता और यादों में डूब जाता वह एक पल खिल-खिलाता दिखता तो दूसरे ही पल उदास नज़र आता।

दरअसल 10 साल पहले जब राकेश स्कूल की ट्रिप से लौट रहा था, उसके माता पिता ने उसे सरप्राइज़ देने का प्लान बनाया। वह अपनी कार लेकर निकले उससे लोनावला में मिलने के लिए। राकेश के पापा उस दिन रोजाना से अधिक तेज गाड़ी चला रहे थे। वे मोड पर गाड़ी का नियंत्रण खो बैठे और गाड़ी पूरे तीन बार पलटियाँ खाकर औंधी पड़ी।

राकेश के पिता की तुरंत ही मृत्यु हो गई माँ का इलाज चला पर दो महीने बाद कोमा में नर्वस ब्रेकडाउन होने के कारण उनकी भी मृत्यु हो गई। इंश्योरेंस वगैरा से राकेश को इतने रुपए तो मिल ही गए कि वह अपने पैरों पर खड़ा हो पाता। अध्ययन रुका नहीं, जिंदगी रुकी नहीं। वक्त रुका नहीं।

वक्त कहां रुकता है किसी के लिए!

राकेश ने परंतु बेहद साहस दिखाया वह टूटा नहीं, ना ही वह रोया। उसके चाचा जी ने उसकी बड़ी सहायता की, परंतु माता-पिता तो माता-पिता ही होते हैं! राकेश के ज़हन में माँ का वह कॉमा में पड़ा शरीर आया और वह तुरंत झेंपा। उसने अपने आंसुओं को पोंछा और जाने के लिए खड़ा हुआ। तभी रेवती की नजर राकेश पर पड़ी। हल्की-हल्की दाढ़ी, जो की चांदनी में चमक-सी रही थी, गेहुआ चेहरा, सफेद फुल स्लीव्स वाली कमीज जिसकी स्लीव्स आधी मुड़ी हुई, आंखों पर चौकोर फ्रेम वाला चश्मा और चेहरे पर उदासी, होठों पर शिकायत आंखों में नमी।

रेवती को यह जानने में देर नहीं लगी कि राकेश क्यों हमेशा गुमसुम रहता है, क्यों सब से कटा-कटा रहता है। उसने अपने आप को संभाला और उठकर राकेश की ओर बढ़ी। राकेश के कानों में रेवती की आहट पड़ी तो वह वहीँ स्थिर खड़ा रहा। रेवती ने राकेश के कंधे पर हाथ रखा-“राकेश..” राकेश मुड़ा और रेवती को बस निहारता ही रहा। रेवती की आंखें हूबहू उसकी माँ की तरह थी: वही घुमाव वही गहराइयाँ। राकेश उसकी आँखों में देखता रहा फिर उसी ने अपनी नजरें झुका लीं। परंतु रेवती स्नेह भरी आँखों से राकेश को एक टक देखे जा रही थी। राकेश थोड़ा झिझका तो रेवती ने उसे आश्वस्त करते हुए कहा- “चांद कितना सुंदर है ना राकेश! कितना शीतल कितना कोमल!” बोलते-बोलते वह झील की ओर नजरें घुमा कर बैठने लगी। फिर उसने गर्दन उठाकर राकेश की ओर देखा और भौएँ उठाए उसने सर से इशारा कर राकेश को बैठने को कहा। राकेश कुछ देर खामोश खड़ा रहा। रेवती चांद को ताक रही थी बोली- “आज मेरे पिता का देहांत हो गया, राकेश। मुझे भी पता चला तुम्हारे परिवार के बारे में। पता है राकेश, भगवान को कुछ लोग कुछ ज्यादा ही प्यारे होते हैं; उन्हें संभालने के लिए वे उनकी परीक्षाएं लेते रहते हैं। मुझे ही देखो मेरा उनके अलावा कोई नहीं था। माँ तो बचपन में ही गुजर चुकी थी जो भी थे, पिताजी ही थे। बोलते बोलते रेवती रो पड़ी। अपने घुटनों पर सर रखकर सिसकने लगी। फिर एकाएक गर्दन उठा कर आंसू पोछते हुए बोली- “पापा आप जहां भी हो मेरी चिंता मत करना।” उसकी नजरें आसमान की ओर ताक रही थीं। “मैं आपको कभी भी निराश नहीं करूँगी”। रेवती ने महसूस किया कि उसके कंधे पर हाथ रखकर किसी ने हौसला दिया है। राकेश की गर्मजोशी रेवती के मन को भा गई। राकेश भी आसमान की ओर देखने लगा- “थैंक यू माँ! थैंक यू सो मच।” बोलते बोलते उसका गला रुंध-सा गया था। फिर दोनों ने अपने सर एक दूजे के सर के सहारे लगाए और आसमान को निहारने लगे। राकेश का हाथ अभी भी रेवती के कंधों पर था।

अगली सुबह राकेश वह राकेश नहीं रहा था। वक्त कैसा भी हो, बदलता जरूर है। राकेश को खुश रहने की वजह मिल गई थी। राकेश अब रेवती के साथ, सभी के साथ घुल-मिल गया था। “अरे रेवती तेरा बॉयफ्रेंड तो तुमसे भी ज्यादा खुश मिज़ाज है।” एक दोस्त ने कहा था,  “वी आर जस्ट फ्रेंड्स” रेवती ने जहीझाँकते हुए कहा था। राकेश में अब जमीन आसमान का फर्क आ चुका था।

एक वीकेंड राकेश और रेवती दार्जिलिंग जा रहे थे। वैसे तो वे अक्सर दोस्तों के साथ वहाँ जाते थे, परंतु यह पहली बार था जब वे दोनो अकेले ही जा रहे थे। राकेश अपनी नई मोटरसाइकिल की रफ्तार दिखाने के लिए तेजी से चलाने लगा। अचानक सामने से रॉन्ग साइड में चलता एक नशे में धुत ड्राइवर ट्रक चलाता हुआ आया। राकेश यूँ तो ठीक-ठाक गाड़ी चला लेता था, परंतु जब दुर्घटना होनी होती है तो हो ही जाती है।

बाइक सीधे ट्रक में जा घुसी। भगवान की कृपा कहो या चमत्कार पर अगल-बगल की नरम झाड़ियों पर गिरने के कारण राकेश को अधिक चोट नहीं आई थी। राकेश की चंद मिनटों बाद आंखें खुली तो देखा कि लोगों की भीड़ इकठ्ठा हो चुकी थी।

राकेश अपना सिर पकड़कर उठा और रेवती को ढूंढने लगा। उसे पता चला कि रेवती को नज़दीकी अस्पताल में ले जाया गए हैं। इससे अधिक लोगों ने कुछ नहीं बताया। राकेश आनन-फानन में अस्पताल पहुँचा और पता चला कि रेवती का ऑपरेशन चल रहा है। चंद घंटों का ऑपरेशन मानो कई-कई सदिया ले रहा हो। राकेश का दिल तेज दौड़ रहा था। जैसे ही ऑपरेशन खत्म हुआ राकेश ने डॉक्टर से स्टेटस पूछा। उसके पैरों तले जमीन खिसक गई।

“ट्रक ने पेशेंट के पैरों को बुरी तरह कुचल दिया है। रेवती अब कभी चल नहीं पाएगी। आर्टिफिशियल लिम्बस लगाने के लिए भी जिन नेर्वेस की आवश्यकता होती है, वे भी डैमेज हो चुकी हैं। पेशेंट एनेस्थेटिक है कुछ देर में होश आ जाएगा।” डॉक्टर तो अपनी बात कह कर चले गए परंतु उनके शब्दों ने मनो राकेश के शरीर में सौ-सौ बाण एक साथ घोंप दिए हों।

डॉक्टर जा चुके थे परंतु राकेश कुछ समय तक एक बुत बना वहीं खड़ा रहा। वह भारी मन के साथ धीमे धीमे अपने कदम बढ़ाने लगा। रेवती को ऑपरेशन थिएटर से अलग कमरे में शिफ्ट कर दिया गया था। राकेश रेवती के कमरे की ओर बढ़ने लगा। उसके पैर इतने भारी हो चुके थे कि वह चल भी नहीं पा रहा था वह जैसे-तैसे रेवती के कमरे तक पहुँचा। रेवती कॉट पर लेटी हुई थी। उसने हिम्मत करके रेवती के पैरों की ओर देखा भारी नुकसान के कारण घुटनों के नीचे के हिस्से को काटना पड़ गया था। राकेश की आंखों से आंसुओं की लड़ियां बह निकली। वह सीलिंग की ओर देखकर चीखना चाहता था पर वह पास पड़े स्टूल पर जाकार बैठाऔर रेवती के ऍमप्यूटेड पैरों को एक टक देखा जा रहा था।

बड़ी देर हो गई राकेश की आँखें भी रो-रो कर आँसू बहा बहा कर थक चुकी थीं; सूख चुकी थीं। चंद घंटों बाद रेवती की आँखें खुलीं।

राकेश अभी भी वहीं बैठा था; अधमरा-सा। जैसे ही रेवती ने राकेश को आवाज़ लगाई राकेश का ध्यान भटका। उसने रेवती की और आँखें की और फिर उसके पैरों की ओर देखने लगा। सूखी आंखो से दोबारा आँसू बह निकले। वह रुंधी रुंधी सी आवाज़ में रेवती की नजरों में नजरें मिलाए बिना बोला-

“मुझे माफ कर दो रेवती।”

रेवती की आंखों में नमी और होठों पर मुस्कान थी। उसने राकेश का हाथ पकड़ा और कहा- “आई लव यू, राकेश। मैं आज बहुत खुश हूँ।” यह सुनकर राकेश ने रेवती की ओर देखा और उसकी आँखों से भी अब पछतावे के नहीं खुशी के आँसू निकल पड़े। उसने रेवती से कहा-“रेवती मैं आज के बाद कभी भी तुम्हें कोई तकलीफ नहीं आने दूँगा। आई प्रॉमिस!”

सच ही तो कहा था राकेश ने! उसके बाद से रेवती कभी उदास होती भी तो राकेश कुछ ना कुछ करके उसकी मुस्कान वापस ले आता। दोनों घंटों बैठकर बातें करते; रेवती अपनी व्हील चेयर पर बैठती और राकेश उसके पीछे खड़ा रहता। दोनों एक दूजे के बिना नहीं रह सकते थे।

तो भला राकेश रेवती को आज कैसे नाराज करता! उसने कहा- “चलो रेवती, हम दोनों साथ चलेंगे गेट टूगेदर में; फिर एक बार जी आएँगे वे पल हसीन; फिर याद कर आएँगे वे सुहाने दिन।” रेवती ने व्हील चेयर में बैठे बैठे अपनी बाहें फैला ली और राकेश ने कसकर रेवती को गले लगाया।

“हुँ; हैं! मैं शायद गलत समय पर आ गई।” श्रुति ने कहा।

तब राकेश ने श्रुति को हाथ से इशारा करके पास बुलाया और तीनों एक साथ प्यार की दुनिया में कहीं लुप्त हो गए। राकेश की आँखों नम थी-

“तुम दोनों ही तो मेरा सब कुछ हो!” फिर श्रुति का माथा चूमते हुए श्रुति के कानों में कहा-

“बेटा चलोगे ना गेट टुगेदर में हमारे साथ?”

श्रुति ने सभी को अलग करते हुए कहा-

“माँ बताओ ना मैं कौन सी ड्रेस पहनूँ आपके फंक्शन के लिए?” और सारे तैयारियाँ करने लगे।

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