जीवन या आत्महत्या

by Abhishek Saran


मैंने बहुत पहले ही अपनी किसी कहानी में लिखा था, आवश्यक है कि प्रतिस्पर्धा दो लोगों के बीच मानवता की सीमा को जरूरी रूप से सहेज कर रखे.
मेरा ये लेख उन लोगों के नाम है जो असफलता के छत पर भटक रहे हैं, तनावग्रस्त हैं और सोच रहे हैं कि जीवन व मृत्यु के बीच कब स्पष्ट रूप से विभाजन किया जा सकता है.
 
संभावनाएं पूर्णतया कभी समाप्त नहीं होती, सबकुछ ख़त्म तब भी नहीं हुआ था जब मैं JEE के इम्तिहान में असफल हो गया था. निश्चित ही आज भी नहीं जब मैं अपने CGPA को 7 से ऊपर रखने की निरन्तर कोशिश में हूँ. आशाएँ तब भी रहेगी यदि मुझे कोई नौकरी नहीं मिले. जीऊंगा मैं तब भी जब मेरी जेब में महंगे शौक पुरे करने के लिए उतने पैसे नहीं होंगे. यद्यपि मैं तब भी एक उधार की किताब पढ़ते हुए उस शख़्स से ज्यादा खुश होऊंगा जो अपनी महंगी गाड़ी में उदास अकेला बैठा होगा.
 
‘आत्महत्या’, यही तो वो शब्द है जिसपे हम तुम बात तक करने से भयभीत है. लेकिन ये समझना आवश्यक है की आख़िर जीया क्यों जाये.
 
पहली बात तो ये की एक परीक्षा में कम अंक आने से सब कुछ समाप्त नहीं हो जाता. यदि मैंने अपने जीवन पर पूर्ण विराम JEE के परिणाम वाले दिवस लगा लिया होता तो मैं न ही तो दूसरा प्रयास कर पाता और न ही IIT में भर्ती हो पाता और न ही ये दो नीले वर्ष गुज़ार पाता जिनमें मैंने भरपूर जीवन जीया है.
 
दूसरी बात ये कि तुम्हें नहीं मालूम आने वाले कल में क्या है. किवाड़ खोलोगे तो पता चलेगा के मेहमान कौन है. हो सकता तुम्हारा बिछड़ा हुआ प्रेमी ही हो. रात को निकल जाने दोगे अपने जीवन से तभी तो उषा में सुरभित श्वाश ले पाओगे.
जीवन गली क्रिकेट सा है साथी, एक मैच में आउट हो जाओगे तो बल्ला मेरा है कहकर घर को भाग तो नहीं जाओगे ना. क्यूँ, क्यूंकि एक आशा है ह्रदय में के अगले मुकाबले में कोशिश करेंगे.
और यदि ऐसे ही एक दिन यदि सारे मुकाबलों हार गये तो अगले दिन आना तो नहीं छोड़ दोगे. क्या करोगे? ये संकल्प ही ना के आज देखते है आ ज़रा, कल का मेरा दिन बुरा था. इसका बड़े स्तर पर सामान्यीकरण ही तो जीवन है. बस यही जीवन के साथ करना है.
 
तीसरी बात की हार को दिल पर नहीं लेना है. हारना स्वभाविक है. आज ही Kota factory का अंतिम एपिसोड देखा उसमें एक संवाद (dialogue) था की यदि आप अपनी क्लास में सबसे बुद्धिमान लड़के हैं तो आप गलत कक्षा में हैं. अब एक क्षण के लिए इसे और तरह से सोचते हैं. अगर आप अपनी क्लास में सबसे कमज़ोर है तो भी इसका मतलब आप गलत कक्षा में है. हो सकता है आप संगीत की कक्षा के सबसे होनहार बालक बन जाओ. ये भी सम्भव है कि आप नृत्य में दक्ष हो जाओ या सम्भव है आप 10 वीं कक्षा में गणित की वज़ह से अच्छा नहीं कर पाये तो आप 12 वीं में कला या वाणिज्य विभाग के श्रेष्ठ विद्यार्थी बन सकते हो. और मान लो यदि ये भी न हो तो क्या, जीवन आगे भी है.
जीवन तुम्हें असंख्य क्षण देगा स्वयं को सिद्ध करने के लिए केवल एक शर्त पर और वो यह कि तब तक तुम्हें जीवित बचे रहना है.
जीवन सतत संघर्ष है मित्र, एक ही लक्ष्य रहे की आख़िर तक जाना है. Alchemist पढ़ी ही होगी नहीं तो पढियेगा. उसमे मोटे तौर पर यही बताया गया है.
 
चौथी बात ये की इस हार का करना क्या है. हार के साथ जीना सीखना है. यानि हार को स्वीकार करना है. मैं पहले हर शाम सोचा करता था की काश यदि रसायन विज्ञान (chemistry) अच्छे से पढ़ता तो आज किसी पुरानी IIT में होता. मगर मैं हर शाम यही सोचते हुए तो स्वयं को उदास कर नहीं सकता ना. फिर क्या विकल्प है? यही ना कि वास्तविकता में जियूँ और ये याद रखूँ के जो हो गया सो हो गया. अतीत वो दर्पण है जिसमें तुम अपनी गलतियां देख कर स्वयं को संवार सकते हो. ये वो चश्मा नहीं है जिससे तुम आना वाले भविष्य को निर्धारित करोगे. जियो उस शाम को कोई अच्छी किताब को पढ़ते हुए. पहाड़ी पर जाकर बैठो, शाम के पीलेपन पर आश्चर्य करो, मुस्करा दो बेझिझक के ये पल फिर न आये.
 
खुश रहना हमारा शाश्वत मकसद है. एक हार से अपनी मुस्कराहट को फीका मत पड़ने देना मित्र. जब समाज पूछे तो जोर से हंस कर निकल जाना. आश्चर्य में डाल देना उस जन को के आख़िर ऐसे जीना इसको कैसे आया.
पड़ोसी और रिश्तेदारों के उन 90 प्रतिशत वालें लड़कों को देखकर मन मसोस कर मत रह जाना. 90 प्रतिशत अंक लाने वाले बच्चे ईश्वर नहीं होते. मेरे भी 10वीं में आए थे लेकिन IIT के इम्तिहान में वो लोग अच्छा कर गये. तो क्या हुआ? क्या मैंने जीना छोड़ दिया? नहीं!
मित्र, कभी कभी कुछ चीज़े हमारे वश में भी नहीं होती। और तुम्हें ये मानना ही पड़ेगा के तुम सब कुछ हासिल नहीं कर सकते. कुछ न कुछ छूट ही जायेगा और इस ‘कुछ’ की टीस से जीवनभर आह न भरना बल्कि कहीं कोई छूटी हंसी भर ले बाँहों में आके तो मना न करना के मुझे प्रेम न कर, मैं श्रापित हूँ, हंसना और भींच लेना बाहों में कसकर ऐसे विलक्षण क्षण को.
 
पांचवीं बात ये की अस्वीकार्यता से सहजता रखना. अगर किसी ने तुम्हारा दोस्ती ठुकरा दी, तुमने किसी से टूटकर प्रेम किया परंतु उसे रोकने में सफल नहीं हुए. तुम दुःखी तो होओगे ही. और कुछ ज्यादा ही क्योंकि बात भावनाओं की है, बात स्वाभिमान की है, बात स्वयं में कमियों की है. तुम रोओगे और रो लेना भी चाहिए. तुम गुस्सा होओगे, जायज है. तुम लुटे हुए महसूस करोगे, सामान्य है. तुम्हारा आत्मविश्वास कमज़ोर पड़ सकता है. और ऐसे में तुम्हें अवसाद जकड़ सकता है. क्योंकि कमज़ोर पर आक्रमण करना सरल है. और ऐसे में तुम तालशोगे जीवन जीने का एक और कारण. सोचोगे अब क्या करना है? मैं बताता हूँ-
 
अपने परिजनों को याद करना है. उनसे कॉल करके बात करनी है. अगर उन्हें बता पाओ तो बेहतर है नहीं तो कम से कम अपने अंदर घुटन को संग्रहित तो मत होने दो. किसी को बता दो. कोई तो होगा जो तुम्हारी सुनेगा.
(और यहां मैं उन सबसे एक अपील करना चाहता हूँ जो हरेक परिस्थति में मज़ाक करते रहते हैं, न करें, अगर कोई आपके पास आकर कुछ बता रहा या बताना चाह रहा है उसे सुनने की कोशिश करें, आप के कुछ क्षण किसी को दुःख से उबार सकते है, कारण बनियेगा उसकी ख़ुशी का. उसे समझने की कोशिश करें, अगर आपके पास कोई समझदार सुझाव हैं तो दें अन्यथा किसी और क़ाबिल इंसान से इस बारे में राय लेके बताएं. अगर बात समझ से परे है तो उसे किसी परामर्शदाता (counselor) के पास ले जाना न भूलें.)
अगर कोई भी नहीं है सूनने वाला तो डायरी में लिख लें. किसी को सामने नहीं बता सकते तो सन्देश भेज दें. ईमेल कर दें. स्वयं को रिकॉर्ड कर लें. मगर कुछ न कुछ जरूर करें. किसी से लगातार बात करते रहे. सामान्यतया ऐसे मामलों में समय अधिक लगता है धैर्य बनाये रखें.
परन्तु अपने मस्तिष्क को बिना किसी वाज़िब तर्क के समझाना तो मुश्किल है लेकिन ये सोचें की किसी को जबरन नहीं रोका जा सकता. दो इंसानों के साथ बने रहने के लिए जरूरी है वो कुछ हद तक तो एक जैसी सोच रखें. प्रतीक्षा करें सही समय की. लंबा सफ़र है, कई जन मिलेंगे, कोई तो तुम जैसा होगा ही, कोई तो तुम्हारी तरफ़ भी दोस्ती का हाथ बढ़ाएगा, कोई तो तुम्हें भी प्रेम पत्र लिखेगा.
इसीलिए मित्र मुख्यधारा में बने रहना है. जीवन जीना भी एक कला ही है.
 
अंतिम बात, निपुणता को अपना जुनून नहीं बनाना चाहिए. 500 में से 499 अंक लाने वाला यदि उत्सव बनाने के बजाय इस बात पर चिंतित है की वो इकाई कहाँ गया तो भाग्य दुविधा में दूर खड़े हैरान जीवन को ओर देखेगा और पूछेगा ये कब से होने लगा. अनुशाषन में रहने का मतलब ये कतई नहीं है की आप मुस्कराएं नहीं. मुस्कराना आना चाहिए. जश्न मनाना आना चाहिए. जीत को जीयें और अच्छे से, बकायदा फटाके फोड़ कर.
कोई भी जीत छोटी नहीं होती सब आपकी मनोदशा है मित्र.
केवल पास होने वाले भी उत्सव मनाते हैं और दूसरी रैंक लाने वाला उदास सोच रहा होता है प्रथम क्यों नहीं आई और प्रथम पाने के लिए एक बार और तैयारी करने की भी सोच लेता है. जीवन इस बार हैरान ही नहीं अपितु शर्मिंदा भी होगा.
 
इसीलिए आशावादी बने रहें, जीवन को सआनंद जीयें, खुश रहें और किताबें पढ़ते रहे.
हाल ही में, मैं Harper Lee का To Kill A Mockingbird पढ़ रहा हूँ. आप क्या पढ़ रहें हैं बताइये कमेंट बॉक्स में.
सधन्यवाद!

 

(The above featured image is a painting ‘The Ninth Wave’ by Ivan Aivazovsky .This painting is often called “The most beautiful painting in Russia.”)

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