Festember Winning Entry

अनुवादित द्वारा- अभिषेक बिश्नोई


मैंने अपने टेलीविजन का स्विच ऑन किया। “5 दिनों में 5 रंगों की हल्की त्वचा पाएं!”- गोरे रंग की एक लड़की, जिसकी आँखें अभिनय करती है, उस तट से चिल्लाई। सौंदर्य प्रसाधन कंपनी से निराश, जो मेरे बाह्य रंग रूप की इतनी अधिक परवाह करती है, मैंने बड़बड़ाते हुए चैनल बदला। और अफसोस! यहाँ भी एक अन्य आत्मविश्वासी महिला से मिलती हूँ जो मुझे बताती है कि कैसे उसने दो सप्ताह में 10 किलो वजन कम किया और खुद का सबसे सुंदर संस्करण बन गई। आश्चर्य तो है, ये लोग मुझसे ज्यादा इस बात की परवाह करते हैं कि मैं खुद को किस तरह से देखती हूं। मैं आईने में झांकती हूं और पाती हूँ एक सांवले रंग की, छोटी बालों वाली लड़की को, जो कुछ किलो वजन कम कर सकती हूँ, घूर कर मानो मुझे कह रही होती है- “हो सकता है कि मैं कल ही टीवी में दिखाए गए बालों के तेल का इस्तेमाल कर सकूं” । मैं क्षण भर के लिए आत्मचिंतन करती हूँ… क्या ऐसे ही तो महान भारतीय सौंदर्य प्रसाधन उद्योग हमारे मन में असुरक्षा की भावना पैदा नहीं करता है, इस भावना के बलबूते पर ही अपना व्यापार प्रसार करता है और इसका उपयोग परजीवी की तरह बढ़ता जाता है।

लेकिन जो हम महसूस करने में असफल होते हैं वह यह है कि ये विज्ञापन कुछ भी नहीं करते हैं, लेकिन एक नकारात्मक शरीर की छवि बनाते हैं-एक संपूर्ण व्यक्ति का अवास्तविक सांचा- चमकती हुई गोरी त्वचा, लंबे बाल और असामान्य रूप से पतले- एक ऐसा सांचा जिसमें हम (या अधिकांश) जबरदस्ती ढलने का अथाह प्रयास करते हैं। और इस सांचे में फिट होने के हमारे प्रयासों में, हम विस्मृत कर देते है स्वयं को, कि हम वास्तव में कौन हैं- उस अद्भुत और आश्चर्यजनक व्यक्ति के साथ जो उन सभी छोटी (स्पष्ट!) खामियों के कारण आपको अधिक मानवीय बनाता है।

हाल के दिनों में, लोग इस बात की अमानवीयता को महसूस कर रहे हैं कि हम अपने आप को किस तरह से जोड़ रहे हैं और इसलिए ‘डार्क इज ब्यूटीफुल’ जैसे अभियान चला रहे हैं। लेकिन केवल चुनाव प्रचार करना ही काफी नहीं है- उन सौंदर्य मिथकों को दूर करने के लिए हमारी ओर से और अधिक प्रयास करने की आवश्यकता है जो हमारे दिमाग में गहरे निहित हैं। हमें उन नकारात्मक प्रभावों को समझने की जरूरत है जो इस तरह की मानसिकता पर हैं। यह एक पूरी तरह से अक्षम्य गलती है जो हम खुद से करते हैं अगर हम खुद को समाज की अवास्तविक अपेक्षाओं द्वारा बनाई गई असुरक्षा के शिकार होने दें। खुद के लिए भी अनजान, हम तनाव के शिकार हो जाते हैं, जो गलत तरीके से भारी मात्रा में दबाव के कारण होता है, जिसे हम ‘सही’ देखने के लिए व्यर्थ प्रयास करते हैं। किसी को भी इस बात का अहसास नहीं है कि खुद का सबसे खूबसूरत संस्करण पूरे समय यहां था, आपकी दीवार के कोने पर उस छोटे दर्पण में आपको घूरता हुआ।

अपनी त्वचा पर गर्व करें- सांवला या गोरा या अपने छोटे पिंपल्स, नाक-कान की बनावट या गाल पर तिल, दाढ़ी या साफ चट चेहरा हो। वे सभी आप का एक हिस्सा हैं, जो हिस्सा आपको इतना सुंदर बनाता है, जो आपको इतना मानवीय बनाता है। अगर हम उस एक व्यक्ति के सभी क्लोन थे, जो संपूर्ण शरीर के साँचे में फिट बैठता है, तो हम सभी व्यक्तित्व को खो देंगे, हम उस सभी अद्वितीय विलक्षणता को खो देंगे जो हम में से प्रत्येक को विशेष बनाती है। इस ऐसी सामाजिक सरंचना का प्रतिकार करे- जब तक आप स्वस्थ और ठीक हैं, तब तक आपका थोड़ा अतिरिक्त वजन हो सकता है। रूढ़ियों से लड़ें, सुंदरता की अपनी परिभाषा बनाएँ। क्योंकि जब हम ऐसा करते हैं, तो हम अंततः सुंदरता की उस सदियों पुरानी धारणा के चंगुल से मुक्त हो पाएंगे और अपने जीवन को पूरी तरह से जी पाएंगे।


LOVE YOURSELF

Originally Written By-  Niranjana S

I switched on my television. “Get 5 shades lighter skin in 5 days!”-cried a girl who looked anemic as hell. Frustrated with the cosmetics company who cares more about me looking ‘5 shades fairer’ (read vampire) I switch the channel.  And alas! Here I encounter yet another anorexic woman telling me how she lost 10 kilos in two weeks to become the most beautiful version of herself. Damn, these people care more about how I look than I do myself. I look in the mirror and see a dark skinned, short haired girl who could lose a few kilos staring at me. “Maybe I could use that hair oil they showed in TV yesterday”-I think to myself. And that is how the great Indian cosmetics industry creates insecurity in our minds, feeds upon it and uses it to grow like a parasite.

But what we fail to realise is that these advertisements do nothing but create a negative body image-an unrealistic mould of a perfect person- with glowing white skin, long hair and abnormally thin- a mould into which all (or most) of us desperately try to fit in. And in our attempts to fit into this mould, we lose track of who we really are- that wonderful and amazing person with all those little (apparent!) flaws that make you more human.

In more recent times, people have been realising the inhumanity of what we are putting ourselves through and hence campaigns like ‘Dark is Beautiful’. But mere campaigning is not enough- there needs to be a lot more effort from our side to shatter those beauty myths that are deep-rooted in our minds. We need to understand the negative impacts that such a mindset has on ourselves. It is an absolutely unforgivable mistake that we do to ourselves if we let ourselves fall prey to the insecurities that are created by the unrealistic expectations of the society. Unknown to even ourselves, we become victims of stress caused by the unfairly huge amounts of pressure that we subject ourselves to, in a vain attempt to look ‘perfect’. Little does anybody realise that the most beautiful version of yourself had been here the whole time, staring back at you from that little mirror on the corner of your wall.

Flaunt your skin- dark, fair or anything in between; be proud of your little pimples. They are all a part of you, part of what makes you so beautiful, what makes you so human. If we were all clones of that one person who fits into the perfect body mould, we would lose all individuality, we would lose all that unique quirkiness that makes each one of us special. Break the mould- you can have a little extra weight as long as you are healthy and fine. Fight the stereotypes, create your own definition of beauty. Because when we do that, we will finally be able to break free from the clutches of that age-old notion of beauty and live our lives to the fullest.

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